नाथू तोता और थावरी की कहानी

नाथू तोता और थावरी की कहानी 

एक घने जंगल में नाथू नाम का तोता रहता था। नाथू बहुत चतुर और बातूनी था। वह दिनभर जंगल में घूमता, अलग-अलग जानवरों से मिलता और उनके साथ मज़ेदार बातें करता।

एक दिन, नाथू जंगल में घूमते हुए थावरी नाम की एक छोटी गिलहरी से मिला। थावरी बड़ी मेहनती थी और हमेशा खाने के लिए मेवे और बीज इकट्ठा करती रहती थी। नाथू ने थावरी से कहा, "थावरी, तुम हमेशा काम में लगी रहती हो। कभी आराम भी कर लिया करो। जीवन का आनंद लो।"

थावरी मुस्कुराई और बोली, "नाथू, मैं ठंड के मौसम के लिए तैयारी कर रही हूँ। जब सर्दियाँ आएंगी, तब मुझे खाने की चिंता नहीं होगी। तुम भी कुछ तैयारी क्यों नहीं करते?"


लेकिन नाथू ने उसकी बात को मजाक में उड़ा दिया। उसने कहा, "मुझे तो ठंड का डर नहीं है। मेरे पास तो पंख हैं, मैं जहाँ चाहूँ उड़ जाऊँगा। मुझे खाने की चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं।"

समय बीतता गया। गर्मी का मौसम खत्म हुआ, और ठंड शुरू हो गई। जंगल में भोजन ढूंढना मुश्किल हो गया। नाथू को भी खाने की तलाश में इधर-उधर भटकना पड़ा। उसे ठंड और भूख से बहुत परेशानी होने लगी।

एक दिन, ठंड से कांपते हुए, वह थावरी के घर पहुँचा। थावरी ने अपने घर में ढेर सारे मेवे और बीज जमा कर रखे थे। नाथू को देखकर थावरी ने कहा, "मैंने तुम्हें पहले ही तैयारी करने को कहा था, लेकिन तुमने मेरी बात नहीं मानी।"

नाथू ने सिर झुकाकर माफी माँगी और कहा, "तुम बिल्कुल सही कहती थी, थावरी। मुझे अब समझ आ गया है कि मेहनत और तैयारी कितनी ज़रूरी है।"

थावरी ने नाथू की मदद की और उसे खाने के लिए मेवे दिए। नाथू ने ठान लिया कि अगले साल वह भी समय पर अपनी तैयारी करेगा।

कहानी की सीख:
आलस्य को छोड़कर हमेशा मेहनत और समय पर तैयारी करनी चाहिए, क्योंकि आने वाले समय में वही हमें मुश्किलों से बचा सकता है।


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